भारत और चीन के रिश्तों में आई तल्खी को केवल वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चल रही गतिविधियों तक सीमित करने से हम सही निष्कर्षों पर नहीं पहुंच पाएंगे। इसके लिए हमें पृष्ठभूमि में चल रही दूसरी गतिविधियों पर भी नजर डालनी होगी। पिछले दिनों जब भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर विवाद खड़ा हुआ, उसके साथ ही लद्दाख और सिक्किम में चीन की सीमा पर भी हरकतें हुईं।

यह सब कुछ अनायास नहीं है। ये बातें जुड़ी हुई हैं। सूत्र बता रहे हैं कि लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिक गलवान घाटी के दक्षिण पूर्व में, भारतीय सीमा के भीतर तक आ गए। वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार भी चीन ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सैटेलाइट चित्रों से इस बात की पुष्टि हुई है कि टैंक, तोपें और बख्तरबंद गाड़ियां चीनी सीमा के भीतर भारतीय ठिकानों के करीब तैनात की गई हैं।

सामरिक दृष्टि से पिछले साल ही तैयार हुआ भारत का दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्दी मार्ग सीधे-सीधे चीनी निशाने पर आ गया है। इस टकराव को खत्म करने की कोशिशें चल ही रही हैं कि शुक्रवार को खबर आई कि अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से अपने संबंध तोड़ लिए हैं।

अमेरिका का कहना है कि यह संगठन पूरी तरह चीन के नियंत्रण में चला गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इतना ही नहीं यह भी कहा कि हमारा प्रशासन अब हांगकांग को दी गई नीतिगत रियायतों को भी खत्म करने की प्रक्रिया शुरू करेगा, क्योंकि चीन ने हांगकांग के विशेष दर्जे को खत्म करने का काम किया है। एक और जोरदार खबर है। अमेरिकी संसद में एक विधेयक पेश किया गया है, जिसमें तिब्बत को पूर्ण स्वतंत्र देश का दर्जा देने की मांग की गई है।

कहना मुश्किल है कि यह विधेयक पास होगा या नहीं, पर इतना साफ है कि चीन के छुट्टा सांड को नाथने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। इसी रोशनी में भारत और चीन के रिश्तों को देखना चाहिए, क्योंकि वैश्विक राजनीति अब चीन समर्थक और चीन विरोधी देशों के रूप में विभाजित होने जा रही है। यानी उत्तर कोरोना विश्व एक नए शीत युद्ध से रूबरू होने वाला है। भारत-चीन टकराव के संदर्भ में राष्ट्रपति ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश करके इसे एक अलग आयाम दिया है। हालांकि भारत ने आधिकारिक रूप से इस बात की पुष्टि नहीं की है, पर इसमें दो राय नहीं कि भारत पर दोनों तरफ से दबाव है।

ट्रंप के बयान का केवल प्रतीकात्मक महत्व है और यह चीन को छेड़ने की कोशिश लगती है। इस बयान के पहले अमेरिकी विदेश विभाग की सहायक मंत्री एलिस जी वैल्स ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत को चीनी दबाव में नहीं आना चाहिए। डिप्लोमेसी के लिहाज से उस बयान के ज्यादा बड़े निहितार्थ हैं। भारत ने हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक में चीन-विरोधी रुख अपनाया था। इतना ही नहीं हाल में ताइवान में नव-निर्वाचित राष्ट्रपति त्साईइंग-वेन के शपथ ग्रहण समारोह में बीजेपी के दो सांसदों, मीनाक्षी लेखी और राहुल कस्वान ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया और वेन को बधाई दी। लेखी और कस्वान समेत दुनिया के 41 देशों की 42 हस्तियों ने इस कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शिरकत की। कोविड-19 के प्रकोप के कारण ताइवान में विदेशियों के आगमन पर पाबंदी लगी हुई है। ताइवान को चीन स्वतंत्र देश का दर्जा नहीं देता।

हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताइवान को लेकर सवाल उठे थे। कोरोना त्रासदी के शुरुआती महीनों में ताइवान ने चीन में पैदा हो रहे संकट की जानकारी डब्लूएचओ को दी थी, जिसने उसकी अनदेखी की, क्योंकि चीन के दबाव में वह ताइवान को मान्यता नहीं देता। दूसरी तरफ कारोबारी विवादों के अलावा दक्षिण चीन सागर, प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा अब खुलकर सामने आ रही है। इसमें भारत भी शामिल है, क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चार देशों का गठबंधन क्वाड धीरे-धीरे शक्ल लेता जा रहा है।

चीन के बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम का भारत ने साफ विरोध किया है और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में चल रहे सीपैक निर्माण कार्यों पर गहरी आपत्ति व्यक्त की है। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ चल रहे समझौता प्रयासों की पृष्ठभूमि में भारत के हित भी जुड़े हैं। पाकिस्तान चाहता है कि इस क्षेत्र में चीन की भूमिका बढ़े पर अमेरिका ऐसा कभी नहीं होने देगा। उत्तर कोरोना विश्व व्यवस्था में चीन अपनी मुद्रा को कारोबार की मुद्रा बनाना चाहता है। अभी तक वैश्विक कारोबार में आमतौर पर डॉलर का इस्तेमाल होता है।

चीन की कोशिश है कि अब उसकी मुद्रा भी कारोबार का माध्यम बने। इन सब बातों के अलावा अमेरिका और जापान की काफी कंपनियां चीन से अपना निवेश वापस लेने जा रही हैं। यह भी कारोबारी टकराव का एक बिन्दु है। क्या इसमें हमारी कोई भूमिका हो सकती है? माना जा रहा है कि इनमें से कुछ कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित किया जा सकता है। यह काम इतना सरल नहीं है। पूंजीपति निवेश तभी करता है, जब उसे फायदा नजर आए।

चीन में निवेश तभी हुआ, जब उसने कई तरह के बंधन तोड़े। याद करें नब्बे के दशक में वह विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनने के लिए वस्तुतः रिरिया रहा था। एक जमाने में हमारी स्थिति अच्छी थी, तब हमने अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना स्वीकार नहीं किया। आज हमारे मुकाबले वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया और बांग्लादेश ज्यादा तेजी से काम कर रहे हैं। भारत में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए कम से कम तीन बड़े काम होने चाहिए। एक, इंफ्रास्ट्रक्चर यानी सड़कें, विमान और रेल परिवहन। बंदरगाहों का विकास और विस्तार।

कारोबारी कानूनों में सरलता और श्रम कानूनों में बदलाव। हमारी नौकरशाही के तौर-तरीकों में भी बदलाव की जरूरत है। भारतीय कारोबारियों, इंजीनियरों और उद्यमियों की रचनात्मक प्रतिभा के लिए यह बड़ी चुनौती का समय है। अब सीमा पर टकराव की ओर फिर से देखें। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार की चीनी रणनीति कुछ बदली हुई और आक्रामक है। सैनिक टकराव की संभावना फिर भी नहीं है। महत्वपूर्ण है वह वैश्विक पृष्ठभूमि, जिसकी परतें धीरे-धीरे खुलेंगी।

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