महाभारत और रामायण में ऐसे कौनसे पात्र है जो दोनों जगह पाए जाते है ?

कई हैं। पहली बात तो अष्टचिरंजीवियों (मार्कण्डेय, बलि, परशुराम, विभीषण, हनुमान, व्यास, अश्वत्थामा एवं कृपाचार्य) में 5 त्रेता या सतयुग के ही हैं, तो वे तो (अभी भी) अवश्य होंगे। किन्तु लिखित वर्णन सब का नही मिलता। फिर भी जितना ज्ञात है बताता हूँ।

एक बात और ध्यान रखें – चिरंजीवी मतलब सदा के लिए जीने वाला नही होता। इसका मतलब कल्प (1000 महायुग या ब्रह्माजी का आधा दिन) के अंत तक जीवित रहने वाले। किन्तु कल्प का समय इतना अधिक होता है (4320000000 वर्ष) कि हम इन्हें अमर कहने लगते हैं। कल्पान्त में होने वाले प्रलय में सबका अंत होता है और ब्रह्मा जी नई सृष्टि की रचना करते हैं। इन सबमे सबसे अधिक आयु लोमश ऋषि की है। भगवान शिव के वरदान के कारण वे उतने कल्प तक जियेंगे जितने उनके शरीर मे रोम हैं। किंतु अंततः उनका भी अंत होगा।

इस उत्तर में देवताओं को नही जोड़ रहा हूँ क्योंकि उनकी आयु वैसे ही बहुत लंबी होती है। साथ ही केवल द्वापर के चिरंजीवियों (व्यास, कृप एवं अश्वत्थामा), जो कलियुग तक जीवित हैं उन्हें भी नही जोड़ रहा। मनु एवं सप्तर्षियों को भी नही जोड़ रहा क्योंकि इनकी आयु देवताओं से भी लंबी है। बस भीष्म के संदर्भ में सप्तर्षियों का वर्णन मात्र है। देवर्षि नारद, बृहस्पति और शुक्राचार्य को भी नही जोड़ रहा हूँ।

तो चलिए अब आरम्भ करते हैं।

  1. परशुराम: परशुराम त्रेता युग के ही व्यक्ति हैं। त्रेता में ही माता सीता के स्वयंवर में उनकी भेंट श्रीराम से होती है। द्वापर में वे भीष्म से युद्ध करते हैं और श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं। कलियुग में ये भगवान कल्कि के गुरु बनेंगे।
  2. हनुमान: ये भी त्रेता के ही व्यक्ति हैं। त्रेता में तो खैर इनकी प्रशंसा से पूरा रामायण भरा है। द्वापर में वे भीम और अर्जुन का घमंड तोड़ते हैं। श्रीकृष्ण भी इनके द्वारा ही बलराम, गरुड़, सुदर्शन चक्र और सत्यभामा का अभिमान भंग करवाते हैं। कलियुग में इनके तुलसीदास को दर्शन देने का वर्णन है।
  3. गरुड़: सतयुग के व्यक्ति। सतयुग में भगवान विष्णु के वाहन बने। त्रेता में श्री राम लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त किया। त्रेता में ही काकभुशुण्डि से भेंट की। द्वापर में हनुमान से टकराये और लज्जित हुए।
  4. विभीषण: ये भी त्रेता के ही व्यक्ति हैं। रावण के छोटे भाई और श्रीराम के भक्त। लंका युद्ध मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। द्वापर में सहदेव का इनसे मिलने का वर्णन आता है जब सहदेव दिग्विजय हेतु दक्षिण दिशा में जाते हैं और इनसे स्वीकृति प्राप्त करते हैं।
  5. जाम्बवन्त: सतयुग के व्यक्ति। सतयुग में समुद्र मंथन के समय पूरी पृथ्वी की सात परिक्रमा कर डाली थी। फिर त्रेता में श्रीराम के सहयोगी बने। द्वापर में श्रीकृष्ण से युद्ध हुआ और फिर उनसे अपनी पुत्री जाम्बवन्ती का विवाह किया।
  6. महर्षि लोमश: ये सतयुग के व्यक्ति हैं। सतयुग में भगवान शिव से अमरता का वरदान मिला। त्रेता में ये दशरथ को उपदेश देते हैं। त्रेता में ही काकभुशुण्डि को श्राप देते है। द्वापर में ये युधिष्ठिर और पांडवों को आशीर्वाद देने इन्द्रप्रस्थ आते हैं। फिर महाभारत युद्ध के पश्चात शरशैया पर पड़े भीष्म से मिलने भी जाते हैं। ये सहस्त्रों कल्पों तक जीने वाले व्यक्ति हैं, यही इनका वरदान भी है और श्राप भी।
  7. महर्षि दुर्वासा: सतयुग के व्यक्ति। महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र और चंद्र एवं दतात्रेय के छोटे भाई। भयानक क्रोधी। सतयुग में इंद्र को श्राप दिया। त्रेता में श्रीराम से मिले। द्वापर में दुर्योधन से मिलकर फिर युधिष्ठिर और अन्य पांडवों से मिले।
  8. ऋषि होत्रवाहन: त्रेता के व्यक्ति, परशुराम जी के बाल सखा। द्वापर में अम्बा से मिले और उन्हें परशुराम के पास जाने का सुझाव दिया।
  9. बाणासुर: त्रेतायुग के व्यक्ति। दैत्यराज बलि का ज्येष्ठ पुत्र एवं महान शिवभक्त। त्रेता में रावण का परम मित्र। सीता स्वयंवर भी देखने को आये थे। द्वापर में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को बंदी बनाया जिस कारण उनसे युद्ध हुआ। उसी युद्ध मे भगवान शंकर भी बाणासुर की ओर से लड़े थे और श्रीकृष्ण और भगवान शंकर में युद्ध हुआ था।
  10. मुचुकुन्द: सतयुग के व्यक्ति। सतयुग में देवासुर संग्राम में इंद्र की सहायता की। फिर इंद्र का वरदान प्राप्त कर सो गए। पूरे त्रेता सोते रहे। द्वापर में श्रीकृष्ण ने कालयवन द्वारा इन्हें जगवा दिया जिससे इन्होंने कालयवन को भस्म कर दिया।
  11. मय दानव: त्रेता के व्यक्ति। त्रेता में मंदोदरी और धन्यमालिनी के पिता, रावण के श्वसुर। द्वापर में श्रीकृष्ण की द्वारिका और पांडवों के इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया।
  12. वासुकि: सतयुग के नाग सम्राट। रामायण में भी इनका वर्णन है। द्वापर में भीम को नागलोक में दर्शन दिए।
  13. आर्यक: नाग सम्राट, त्रेता के व्यक्ति। नागराज वासुकि के साथ द्वापर में भीम को दर्शन दिए।
  14. तक्षक: वासुकि के समकालीन, कश्यप और क्रुदृ के 1000 पुत्रों में से एक। इंद्र के परम मित्र। द्वापर में खांडवप्रस्थ की आग से बच निकले। कलियुग में परीक्षित को काटा और फिर जनमेजय के सर्पयज्ञ से बचे।
  15. रेवती एवं ककुद्मी: सतयुग की कन्या। इनके पिता ककुद्मी सतयुग में इन्हें लेकर योग्य वर की खोज में ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्मदेव ने कहा वापस पृथ्वी पर जाइये, इस कन्या का वर वही मिलेगा। जितने समय आप यहां रुके, पृथ्वी पर दो युग बीत गए। वे वापस पृथ्वी पर आए तो द्वापर आ चुका था। ब्रह्माजी की आज्ञानुसार रेवती का विवाह बलराम से किया।
  16. नहुष: सतयुग के व्यक्ति, पुरूरवा के पौत्र, ययाति के पिता। इंद्र के पद को प्राप्त किया पर सप्तर्षि द्वारा श्राप मिलने पर अजगर के रूप में परिणत हो गए। द्वापर में भीम को जकड़ा और युधिष्ठिर द्वारा उनके प्रश्नों के सही उत्तर देने पर ही उन्हें छोड़ा।
  17. महर्षि अगस्त्य: सतयुग के व्यक्ति। त्रेता में श्रीराम को कई दिव्यास्त्र दिए। द्वापर में पितामह भीष्म से उनके अंतिम समय मे आये।
  18. काकभुशुण्डि: इनका तो कल्प ही अलग है। ये पिछले कल्प के कलियुग में जन्मे। महान शिव और राम भक्त। लोमश ऋषि के शाप से कौवे का रूप मिला। 1000 जन्म लिए और सब कुछ याद रखा। गरुड़ की शंका का समाधान भी इन्होंने किया जो रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है। इन्होंने 11 बार रामायण और 16 बार महाभारत होते हुए देखा।
  19. सप्तर्षि: सातों ब्रह्मपुत्र – अंगिरा, पुलह, पुलत्स्य, क्रतु, अत्रि, मरीचि एवं वशिष्ठ। सभी सतयुग के व्यक्ति। त्रेता में वशिष्ठ तो श्रीराम के कुलगुरु हुए। बंकियों में से कुछ से श्रीराम वनवास के दौरान मिले, जिनमे से अत्रि प्रमुख थे। द्वापर में सातों सप्तर्षि अंत समय मे भीष्म से मिलने आये और उन्हें उपदेश दिया। ये सभी वैसे भी कल्पांतजीवी हैं।

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